Hindi Blogs, Best Indian Blog

Nirmaltara's Blog

Just another weblog

80 Posts

59 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.

सन्त या चंट

पोस्टेड ओन: 26 Jan, 2012 जनरल डब्बा में

’सन्त’, देहधारी व्यक्ति नहीं, एक मनस्थिति है। यह मनस्थिति किसी में भी हो सकती है। शायद आवरण और उपाधि लादे ’सन्तों’ में यह
मनस्थिति उतनी नहीं होती, जितनी अनाम और अविज्ञप्त लोगों में होती है। कभी¬­कभी ऐसे लोगों में भी जिन्हें समाज दस्यु कहता है। सत्ता जिनके खून की प्यासी होती है। वह मनस्थिति जिसमें ’हूँ’ या ’अहं’ शेष नहीं रहता। सुख¬­दुख, हानि¬लाभ, जय.­पराजय, निन्दा¬­स्तुति अर्थहीन हो जाते हैं। जो भी मिल गया वही पर्याप्त लगने लगता है। कोई चाहत नहीं, कोई आसक्ति नहीं, कोई द्वेष नहीं। गाँधी की तरह बकरी की टाँग के दर्द और भारत की स्वतंत्रता के संघर्ष में कोई भेद नहीं। मैं कर रहा हूँ, ऐसा बोध नहीं। कोई दिखावा नहीं, संसार के सारे कामों को करते हुए भी आत्मलीन। दीनों से भी दीन, अधम से भी अधम, सब से नीचे, सबके पीछे, सर्वहारा लोगों के बीच अपने आराध्य को खोजता मानव। ऐसे लोग हर युग में हर समाज में होते हैं। उन्हें वही जानता है, जो उनके संसर्ग में आता है।
परमात्मा तो ’निरुपाधि’ है। नेति¬नेति। उपाधि या कंचुक, आवरण, छल कपट, दिखावा, बाहरी छाप। अपनी वास्तविकता को छिपाने के लिए ओढ़ा हुआ खोल। गैरिक वसन, श्री 108 श्री श्री 1008, मंडलेश्वर, महामंडलेश्वर, परमहंस परिब्राजकाचार्य, स्वामी, योगश्वर…… क्या है यह सब। परमात्म चिंतन का दिखावा करने वाले सांसारिकता में डूबे तथाकथित तत्वज्ञानी अज्ञानियों का हुजूम।
शंकराचार्य के शब्दों में ’सब पापी पेट के लिए है। ’उदरनिमित्तं बहुकृतवेशं’। किसी का पेट केवल भोजन से भरता है, किसी को कुछ और भी चाहिए। मान­सम्मान, पद, पीछे लगने वाला चरणचुंबन को तैयार हुजूम, जयजयकार, कौशेय वसन, सोने की थाली में भोजन और चाँदी की झारी में गंगाजल पानी। श्रव्य¬दृश्य माध्यमों में पल¬पल प्रसारित होते हुए हुए रूप और शब्द। संसार ही नहीं घोर संसार। वास्तविक सा दिखता छद्म। वह छद्म जो मानव समाज के टुकड़े¬­टुकड़े करता है। निरीहों की बलि लेता है। जो छद्म को अनावृत करे उसकी मौत …क्रास पर लटका ईसा और हर नये ईसा को क्रास पर लटकाने को उद्यत ईसा मसीह के फर्माबरदार। वे ही नहीं और भी। इतिहास साक्षी है। एक बार फिर कबीर की याद आने लगता है:
साधो जग बौराना
साँच कहौ तो मारन धावै, झूठे जग पतियाना

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...

3 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Similar articles : No post found

Post a Comment

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jlsingh के द्वारा
January 29, 2012

बहुत ही सुन्दर लेख!….. संत की व्याख्या! …..शीर्षक थोड़ा अच्छा देना चाहिए था!

abodhbaalak के द्वारा
January 28, 2012

निर्मल जी
सुन्दर, आध्याम्त के रंग में रंग ………..
ऐसे ही लिखते रहें
http://abodhbaalak.jagranjunction.com

Sumit के द्वारा
January 28, 2012



  • ज्यादा चर्चित
  • ज्यादा पठित
  • अधि मूल्यित